हम कल भी थे,
हम आज भी हैं
और हम कल भी होंगे
न जाने हम तब
कैसे होंगे ?
रिश्ते यह पिंजरे से हैं,
रिश्तों के यह बंधन जो
आज हैं हमारे
छुट गए जिस क्षण
तोड़ यह बंधन
हो मुक्त वो जाएगा।
वह पंची उड़ जाएगा।
एक दिन शायद यह सपना
है जो उसका वो पूरा हो जाएगा।
पर कैसे?
आखिर कर्त्तव्य कुछ निभाने हैं
लौट आएगा, रिश्तों को यों भुला ना पायेगा
पर कैसे?
किस रूप में, कब और कहाँ
यह बात न कोई जान पायेगा
रिश्तेनुमा पिंजरा न पहचान पायेगा ।

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