Saturday, 7 April 2012

अधूरी सी ही यह दास्ताँ रह जाती है

जाने वो कौन - कौन से,
द्वार खट-खटाती है।
फिर भी न जाने क्यों?
कुछ न पा पाती है ।
और फिर एक बात अनकही ही रह जाती है ।
जाने क्या बात है की हर बार ही,
अधूरी सी ही यह दास्ताँ रह जाती है !


न जान पाया है कोई की,
क्या पूरी होगी वो कभी?
पर इतना है सबको पता
की अंतिम घडी है दूर अभी।
घुप्प उन अँधेरे रहस्यों के पीछे पाई जाती है,
और तब
की ही तरह इस बार भी
अधूरी सी ही यह दास्ताँ रह जाती है !


जब आखिरकार, मिलने लगते हैं
हमारे हज़ारों सवालो के नायाब जवाब
तब गोपनीय ढंग से कहीं पर
हमारी किताब
ही खो जाती है।
अपने साथ हर बार वह भीषण तबाही लाती है
मानो साथ में जैसे अस्पष्ट एक तूफान लाती है, और
अधूरी सी ही यह दास्ताँ रह जाती है !


जब मिलने लगती है मंजिल, तो रास्ता है धुधला जाता
लाख खोजने पर भी, फिर न वो है मिल पाता
इसी तरह वह चाबी भी
कभी मिल नहीं पाती है
जो अंतिम दरवाज़े के पीछे का दृश्य दिखलाती है।
और सब-कुछ जानती- बुझती
अधूरी सी ही यह दास्ताँ रह जाती है

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