Tuesday, 10 April 2012

वो रोमानी सी मुस्कान थी बस

वो रोमानी सी मुस्कान थी बस
बहुत पुरानी सी इक याद थी बस

शहर में बसी, झूठी शान थी बस
हकीकत की यहाँ थी हलकी ही प्रतीति बस

न जाने वो गली ही क्यूँ ख़ास थी बस
मन में अबूझी सी एक प्यास थी बस

जहन में विदित एक अनुभूति व्याप्त थी बस
केवल मन को ख़ुशी नहीं प्राप्त थी बस
 

असफल सी,अधूरी सी एक आस थी बस
बड़े से घर में छोटी सी जान थी बस

मिटी-मिटाई सी, बच गई जो वो ही पहचान थी बस
नाम भर की उस घर में थी सुभगता, वो भी एक ख्वाब थी बस

घर की याद टूटे-बिखरे रूप में मकान थी बस 

बिछड़ गयी सालों पहले मैं अनजान थी बस

जीने का दिल नहीं रहा, बाकी सिर्फ सांस थी बस
पैरो में फ़ालिज का कारण महज फांस थी बस

तन्हाई ही इकलौती रह गयी, वही पास थी बस
भीड़ में अकेलेपन का एहसास थी बस

जिंदगी के गोलाम्बर में अटकी, वही रही तक़दीर बस
उम्मीद की एक आड़ी-तिरछी सी
थी लकीर बस

हाथ में पतवार नहीं, साथ डूबती कश्ती थी बस
मंजिल पर पहुंचकर भी नजर में आ रही सिर्फ एक बस्ती थी बस

मन में अरमान बसाने की फरमाइश थी बस
कुछ कर दिखने की धधकती सी ख्वाहिश थी बस

जब कुछ नहीं रहा तो बची, सिर्फ आँखों में चमक थी बस
सीने में चुभती हुई , दबी सी कसक थी बस

नमी में ही आग को बुझाने की शक्ति थी, बस
पलकों पे जिद की एक सख्ती थी बस

एक वक़्त में मौत को हराने की संजीदगी थी बस
अब जो शेष रही, वो सिर्फ जिंदगी थी बस

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