Friday, 2 September 2011

मन में संशय क्यूँ ?

बिखरी है चांदनी 
रात का कोलाहल 
मन में संशय क्यूँ ?

जागती है आँखे 
सोती है आँखे
स्वप्न देखती हैं आँखे
खुलती है जब आँख 
तो सामने जो होता है, वह है 'सच'
मन में संशय क्यूँ ?
 
कहते हैं लोग
जवाँ होती है राते,
रोशनियों के बीच लम्बे हैं साएँ, 
कहीं जूनून, कहीं उन्माद
कहीं भीतर का वहशीपन 
मन में संशय क्यूँ ?


सफलता और असफलता
मन की है सोच एक
चमकती दुनिया भी
कालिखों को मिटा कहाँ पाती
मन पे पड़ी धुंध जब साफ़ हो
एवं क्षणिक  उम्मीद ही मन का विश्वास हो
मन में संशय क्यूँ ?

Sunday, 28 August 2011

लोग आगे बढ जाते हैं

लोग अपने आप आगे बढ जाते है !
जाने यो जाने को, कहाँ से आते है ?

जीवन के सब हारे सबक, सीख़ हमें सिखाते हैं ,
जो देते हैं अतंतः वही पाते हैं |

कुछ किस्से हमेशा पर याद रह जाते हैं ,
गुमनाम ही सही, अलफ़ाज़ मगर खो भी कहाँ पाते है ?

बदलते वो मिजाज एक बार फिर बदल ही जाते हैं ,
भुलाए वो यार आज फिर याद आते हैं |

दफ़न किये किस्से फिर दोहराए जाते है ,
ही उन पे पड़ी धुल ही कभी हटाते है |

वकत के लम्हे यूँही आगे बड़े जाते है ,
साथ मैं अपने वो हमें भी खींच लाते है |

समय अपने साथ सब जन कम ही लाते हैं,
बहुत कम उसमे दिलों को छु पाते हैं |

अपना जीवन जी, कुछ लोग, दुसरो को जीना सिखाते हैं,
साथ रखने के लिए पर सिर्फ यादें दे जातें हैं |

और लोग भी धीरे-धीरे, अपने आप
एक बार फिर से आगे बढ जाते हैं |

क्यूँ ?

क्यूँ जिंदगी के पन्ने पलटते हैं ?
क्यूँ रस्ते हमेशा बदलते हैं ?
क्यूँ जिंदगी नया मोड़ लेती है ?
क्यूँ वह टेड़ी-मेडी होती है ?
क्यों रात में सन्नाटा छाता है ?
क्यूँ दिन में सूरज आता है ?
कहाँ जाता है वह जो मर जाता है ?
क्या लौट के फिर पाता है ?
क्या रोज एक तारा टूटता है? 
क्या शीश महल सिर्फ फूटता है ? 
क्यूँ बताना मुश्किल होता है ,
जो दिल में वाकई होता है ?

Sunday, 24 July 2011

बंद आँखें

स्वप्न देखती आँखों को खुला हमेशा रखना
बंद कहीं हो ना जाये यह दुआ हमेशा करना
की कहीं जब पूरा होने वाला हो, वो सपना
तब आँख तुम्हारी खुल भी पाएगी
और भलेही दोष तुम्हारा सारा किस्मत ले जाएगी
पर सच तो होगा यह की जब मौका मिला था
तब तुमने तो अपनी आंखे बंद कर रखी थी
और बाद में कह दिया की किस्मत आड़े मेरे खड़ी थी
पर यह तो समझो अनजाने
की जो खोया वो तुमने खोया
किस्मत का क्या जाता ?
वो तो तुम्हे मौका दे-दे हारी जाती है
पर अक्ल कहाँ तुम्हे पाती है
ऐसे में तो तुम सदा ही सोते रहोगे
बाद में किस्मत को कोस
जिंदगी भर खोते रहोगे|

Thursday, 21 July 2011

हाँ , तू मेरे पास है !

                                        शबनबी बूंदों से छू लेते हैं 
                                             वो एहसास हमें,
                                        आँख खोल कर देखती हूँ 
                                         तो तुम दिखते नहीं हो 
                                     कहाँ हो तुम ? मेरे पास हो तुम ?

जब भी कांटो ने किया जख्मी मुझे
अपनों ने दी आंसुओ की सौगात 
      वो तुम्हारा साथ था 
    वो तुम्हारा ही हाथ था 
जिसने मुझे जीने को प्रेरित किया
 एक बार फिर मुस्काना सिखाया
  कहाँ हो तुम? मेरे पास हो तुम?
  दिखते नहीं हो पर साथ हो तुम ....


                                      यह अकिंचित एहसास जो जीने का सार है 
                                          राह की हर मुश्किल में तू मेरे साथ है 
                                                      दुर्गम उन मोड़ो पर
                                                    ठिठके उन कदमो में -
                                                      तू बस मेरे साथ है !

 और क्या चाहा मैंने , बस तेरा ही साथ चाहा 
निकल कर एहसासों से स्पर्श कर जीना चाहा 
         छूना चाहा , सहलाना चाहा 
                 कहाँ है तू ?
                मेरे पास है ?
         हाँ यह मुझे एहसास है !    
           की तू मेरे साथ है |