Sunday, 28 August 2011

लोग आगे बढ जाते हैं

लोग अपने आप आगे बढ जाते है !
जाने यो जाने को, कहाँ से आते है ?

जीवन के सब हारे सबक, सीख़ हमें सिखाते हैं ,
जो देते हैं अतंतः वही पाते हैं |

कुछ किस्से हमेशा पर याद रह जाते हैं ,
गुमनाम ही सही, अलफ़ाज़ मगर खो भी कहाँ पाते है ?

बदलते वो मिजाज एक बार फिर बदल ही जाते हैं ,
भुलाए वो यार आज फिर याद आते हैं |

दफ़न किये किस्से फिर दोहराए जाते है ,
ही उन पे पड़ी धुल ही कभी हटाते है |

वकत के लम्हे यूँही आगे बड़े जाते है ,
साथ मैं अपने वो हमें भी खींच लाते है |

समय अपने साथ सब जन कम ही लाते हैं,
बहुत कम उसमे दिलों को छु पाते हैं |

अपना जीवन जी, कुछ लोग, दुसरो को जीना सिखाते हैं,
साथ रखने के लिए पर सिर्फ यादें दे जातें हैं |

और लोग भी धीरे-धीरे, अपने आप
एक बार फिर से आगे बढ जाते हैं |

क्यूँ ?

क्यूँ जिंदगी के पन्ने पलटते हैं ?
क्यूँ रस्ते हमेशा बदलते हैं ?
क्यूँ जिंदगी नया मोड़ लेती है ?
क्यूँ वह टेड़ी-मेडी होती है ?
क्यों रात में सन्नाटा छाता है ?
क्यूँ दिन में सूरज आता है ?
कहाँ जाता है वह जो मर जाता है ?
क्या लौट के फिर पाता है ?
क्या रोज एक तारा टूटता है? 
क्या शीश महल सिर्फ फूटता है ? 
क्यूँ बताना मुश्किल होता है ,
जो दिल में वाकई होता है ?