Friday, 2 September 2011

मन में संशय क्यूँ ?

बिखरी है चांदनी 
रात का कोलाहल 
मन में संशय क्यूँ ?

जागती है आँखे 
सोती है आँखे
स्वप्न देखती हैं आँखे
खुलती है जब आँख 
तो सामने जो होता है, वह है 'सच'
मन में संशय क्यूँ ?
 
कहते हैं लोग
जवाँ होती है राते,
रोशनियों के बीच लम्बे हैं साएँ, 
कहीं जूनून, कहीं उन्माद
कहीं भीतर का वहशीपन 
मन में संशय क्यूँ ?


सफलता और असफलता
मन की है सोच एक
चमकती दुनिया भी
कालिखों को मिटा कहाँ पाती
मन पे पड़ी धुंध जब साफ़ हो
एवं क्षणिक  उम्मीद ही मन का विश्वास हो
मन में संशय क्यूँ ?